महिला सशक्तिकरण : महिला-पुरुष एक ही हल के हिस्से – एक के बिना लक्ष्य पाना मुश्किल -CM

झारखण्ड महिला सशक्तिकरण : मौजूदा हेमन्त सरकार की नीतियों के कैनवास में महिला सशक्तिकरण को आंके तो मालूम पड़ता है कि राज्य में इस दिशा में कई बड़ी रेखाएं खिंची गयी है

रांची : अन्तरराष्ट्रीय स्त्री आन्दोलन की नेता क्लारा जे़टकिन के वक्तव्यों में 1920 में स्त्रियों की घरेलू ग़ुलामी और पुरुष-स्वामित्ववादी मानसिकता के प्रति गहरी नफ़रत दिखी थी. उनका मानना था कि औरतों की घरेलू ग़ुलामी व “पुराने दास स्वामियों जैसी” मानसिकता से संघर्ष किये बिना क्रान्ति डग आगे नहीं भर सकती. आधी आबादी की लामबन्दी के बिना स्त्री मुक्ति संभव नहीं है. राजनीति पर स्त्री मज़दूरों को जागृत और संगठित करने में पर्याप्त ज़ोर न देने की प्रवृत्ति की कटु आलोचना भी की थी.

101 वर्ष पहले अक्टूबर 1917 में दुनिया के एक छोर में स्त्रियों को समानता के अवसर और अधिकार मिले थे. हर क्षेत्र में सक्रियता के अवसर देने के साथ घरेलू दासता से छुटकारे हेतु सामाजिक संस्थाएँ खड़ी हुई. और यहीं से क़ानून पुरुष स्वामित्ववाद के विरुद्ध स्त्री समानता को प्रभावी बनाने की स्पष्ट रेखा खिंची. अर्थतंत्र, प्रशासन, क़ानून, शिक्षा व सरकार चलाने के कामों में भागीदारी हेतु औरतों के लिए दरवाजे़ खुले. भारत में इस विचारधारा ने गति तो पकड़ी लेकिन मौजूदा दौर में भाजपा की केन्द्रीय सत्ता की नीतियों व प्रशासनिक व्यवस्था के अक्स महिला सशक्तिकरण की रफ़्तार ज़रुर धीमी हुई है.

हेमन्त सरकार की नीतियों के कैनवास में महिला सशक्तिकरण

झारखण्ड की पृष्ठभूमि में, मौजूदा हेमन्त सरकार की नीतियों के कैनवास में महिला सशक्तिकरण को आंके तो मालूम पड़ता है कि राज्य में इस दिशा में कई बड़ी रेखाएं खिंची गयी है. महिलाओं को हडिया-दारू जैसे अभिशप्त जीवन से मुक्त कर सामुदायिक रसोईघर, सार्वजनिक भोजनालय, लॉण्ड्री, मरम्मत की दूकानें, शिशुशालाएँ, किण्डरगार्टेन, बालगृह, शिक्षा संस्थान जैसे कई प्रक्षेत्रों में आर्थिक मदद पहुँचा प्रेरित किया गया है. संक्षेप में कहें तो, घरेलू और शिक्षा सम्बन्धी कार्यों को व्यक्तिगत गृहस्थी के दायरे से समाज के दायरे में स्थानान्तरित कर संविधान के शर्तों को पूरा करने के लिए हेमन्त सरकार में पर्याप्त संजीदगी दिखी है. 

झारखंडी महिलायें घरेलू ग़ुलामी और पुरुष स्वामित्ववाद से निर्भरता से मुक्त हो रही है. उसे सक्षम बनाने का प्रयास हुआ है. वह समाज में क्षमताओं और अभिरुचियों के हिसाब से अपनी भूमिका तय करे, बेहतर अवसर दिये जा रहे हैं. स्त्री मज़दूरों की सुरक्षा को लेकर भी सरकार संवेदनशील दिखी हैं. सरकार ने कुपोषण से लड़ते हुए प्रसूति गृह, माँओं और बच्चों के देखभाल सम्बन्धी, नवजातों और बच्चों के लालन-पालन सम्बन्धी तमाम प्रक्षेत्रों में संवेदनशील रुझान दिखाया है. ज़रूरतमन्द व बेरोज़गार महिलाओं की ज़रूरतें पूरी करने के दिशा में भी सरकार प्रयासरत दिखी है.

महिला-पुरुष एक ही हल के हिस्से – किसी एक के बिना लक्ष्य पाना मुश्किल

ज्ञात हो, झारखण्ड में महिला दिवस के दिन मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन को बढ़ चढ़ हिस्सा लेते देखा जाते है. उनके द्वारा झारखण्ड के महिला नेत्रियों-जनप्रतिनिधियों को हौसला-अफजाई, सम्मान देने की ईमानदार परम्परा की शुरुआत हुई है. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि कहा कि उनकी सरकार राज्य की महिलाओं के जरूरत के हिसाब से योजनाएं बना रही है. हर माध्यम से महिलाओं को प्रोत्साहन देना सरकार की प्राथमिकता है. उनकी सरकार महिला शक्ति के साथ कदम मिलाकर चलने को संकल्पित है. हर हाथ को रोज़गार देना सरकार का लक्ष्य है. महिला-पुरुष एक ही हल के हिस्से हैं. किसी एक के बिना कोई भी लक्ष्य पाना मुश्किल है.

संपादकीय: यह विश्लेषण स्वतंत्र तथ्यों पर आधारित है।

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