भाजपा-आजसू के राजनीतिक इतिहास के सच तले झारखण्ड के समक्ष स्थायी स्थानीय नीति परिभाषित करना एक बड़ी चुनौती 

झारखण्ड : CM के क्रिया कलाप दर्शाते हैं कि वह नयी स्थानीय नीति परिभाषित करने की दिशा में बढ़ चले है, लेकिन हड़बड़ी में नहीं. स्थायी स्थानीय नीति लागू करना हेमन्त सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं. सीएम हेमन्त सोरेन सभी वर्गों को एक मंच पर बिठा कर बात करने के लिए जाने जाते है

रांची : झारखण्ड में 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति की मांग लम्बी है. राज्य की राजनीति में सीएनटी-एसपीटी के बाद सबसे अधिक हलचल मचाने वाल मुद्दा भी है. हालांकि झारखंडी मानस का  1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति की मांग केवल अधिकार संरक्षण से सम्बंधित है. लेकिन, झारखण्ड में 21 वर्षों के राजनीति इतिहास में भाजपा के लिए 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति का मुद्दा केवल शान्ति भंग एवं राज्य की संपदा लूट का जीवंत सच लिए है. 

ज्ञात हो, राज्य गठन के बाद तत्कालीन भाजपा के सीएम बाबूलाल मरांडी की सरकार में, 2002 में राज्य की राजनीति में स्थानीय नीति को लेकर डोमिसाइल नीति लाया गया. राज्य में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और हिंसा में लोगों की मौतें हुई. लेकिन, आखिरी सच है कि  – भाजपा की रघुवर सरकार में 1985 को आधार बना स्थानीय नीति परिभाषित किया. मामला हाईकोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने उसे अमान्य घोषित कर रद कर दिया. और विडम्बना है कि साजिश में आजसू पूरी तरह से शामिल रही. सच यही इसे जैसे मानना चाहें मान लें. 

मुख्यमंत्री के क्रिया कलाप दर्शाते हैं कि वह नयी स्थानीय नीति बनाने की दिशा में बढ़ चले है, लेकिन हड़बड़ी में नहीं

झारखण्ड की राजनीति में एक बार फिर 1932 खतियान का मुद्दा गरमाया है. फिर विडम्बना है कि 1985 आधारित स्थानीय नीति परिभाषित करने वाले दल आज 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति परिभाषित करने की मांग कर रहे हैं. जाहिर है उनकी मांग में राजनीति छिपी है. ऐसे में यदि 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति लागू कर भी दिया जाता है तो कोई गारंटी नहीं है कि राज्य में भाजपा-आजसू की राजनीति के कैनवास में यह स्थानीय नीति स्थायी साबित होगा. मुद्दे पर भाजपा-आजसू राजनीति करती रहेगी और लोगों के अधिकार छीने जाते रहेंगे.

ऐसे में यदि राजनीति से परे, राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के क्रिया-कलाप दर्शाए कि वह इस मुद्दे का स्थाई हल निकालने दिशा में बढ़ चले है. सरकार हड़बड़ी में नहीं बल्कि सामाजिक, संवैधानिक जैसे तमाम पहलूओं को समझ कर फैसला लेने के पक्ष में दिख रही है तो राज्य के लिए राहत भरी खबर हो सकती है. 

दीर्घकालिक/स्थायी स्थानीय नीति लागू करना हेमन्त सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं

झारखण्ड की पारम्परा में शान्ति, स्थिरता व अधिकार हेतु डट कर खड़ा होना निहित है. इतिहास गवाह है झारखण्ड ने अतिथियों का दोनों हाथ फैला स्वागत किया है. झारखण्ड की धरती जहाँ यह सच लिए हुए है कुछ अतिथियों ने झारखण्ड का भला किया तो कुछ के मंशे गलत रहे हैं. कुछ झारखंडी झारखण्ड की प्रभुता के लिए लड़ते रहे हैं तो कुछ विभीषण के किरदार निभाने से भी नहीं चुके है, चुक रहे हैं. ऐसे में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन व सरकार के लिए दीर्घकालिक/स्थायी स्थानीय नीति लागू करना किसी चुनौती से कम नहीं है.

स्थायी नई स्थानीय नीति परिभाषित करने में हेमन्त सरकार के समक्ष 4 प्रमुख चुनौतियां है जिस पर शायद मुख्यमंत्री गंभीरता से विचार कर सकते हैं.

  1. झारखण्ड में 1932 खतियान का मतलब है कि 1932 के वंशज ही झारखण्ड के असल निवासी माने जाएं.
  2. झारखण्ड में विस्थापन एक गंभीर समस्या रही है और राज्य में अधिकाँश मूल जनता खतियान रहित हैं.
  3. कोर्ट के आदेश का अध्ययन व संविधान में निहत मानवीय मूल्यों का भी ध्यान रखना जाना है. 
  4. वैसे बाहरी गरीब जनता जो दूसरी पीढ़ी तक चुकी है, जो राज्य में सामाजिक-आर्थिक- राजनैतिक रूप में भागीदारी के साथ मौजूद है. जो दरकिनार नहीं हो सकते और न चाहते हुए भी भाजपा की फूट डालो राज करो राजनीति का हिस्सा बनने को मजबूर होते हैं.

मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन सभी वर्गों को एक मंच पर बिठा कर बात करने के लिए जाने जाते है

मसलन, राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन राज्य के समस्याओं के स्थायी हल निकालने के लिए जाने जाते है. उन्होंने जेपीएससी नियमावली, पारा शिक्षक जैसे जटिल समस्याओं का हल बखूबी निकाल कर साबित भी किया है. मुख्यमंत्री हमेशा शांति व्यवस्था-समन्वयता के पक्षधर दिखे है. वैसे भी झारखण्ड शांति मार्ग पर विश्वास करता है. और मुख्यमंत्री ने बुद्ध-विवेकानन्द-भगवान बिरसा-अम्बेडकर जैसे महापुरषों के सिद्धांतो पर चल कर स्वच्छ राजनीति का उदाहरण भी पेश किया है. मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन सभी वर्गों को एक मंच पर बिठा कर बात करने के लिए जाने जाते है.

ऐसे में मुख्य्मंत्री समेत सरकार को ऐसी स्थानीय नीति के तरफ बढ़ना चाहिए जिसके अक्स में 1932 वालों को उसके अनुरूप अधिकार प्राप्त हो. विस्तापितों को मूलवासी का दर्जा हो और उनके अधिकार सुनिश्चित हो. और वैसे बाहरी जो दूसरी पीढ़ी में प्रयेश कर चुके हो उसे देश के संवैधानिक प्रावधानों के अनूरूप अधिकार मिले. जब राशनकार्ड को बीपीएल-एपीएल में वर्गीकृत किया जा सकता है तो यह भी संभव हो सकता है, जरुरत है तो केवल विचार करने की. झारखण्ड की धरती देश में समन्वयता का एक प्रत्यक्ष उदाहरण बन सकता है. फूट डालों की राजनीति का समापन हो सकता है. सभी को झारखण्ड के विकास में भागीदार बनाय जा सकता है.

संपादकीय: यह विश्लेषण स्वतंत्र तथ्यों पर आधारित है।

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