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शीर्ष अदालत ने झारखण्ड हाईकोर्ट में सीएम पर चल रहे सुनवाई पर लगाई रोक 

August 17, 2022 by najhma Leave a Comment

शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने ED पर उठाया सवाल – आपके पास सोरेन के खिलाफ इतने सबूत हैं तो कार्रवाई करिए. PIL याचिकाकर्ता के कंधे पर बंदूक क्यों चला रहे हैं? सुप्रीम कोर्ट अब तय करेगा कि झारखण्ड हाईकोर्ट में सोरेन के खिलाफ कार्रवाई चलती रहेगी या नहीं.

रांची : भाजपा द्वारा झारखण्ड के आदिवासी मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन पर चौतरफा हमले हो रहे थे. हेमन्त सोरेन पर शेल कंपनियों के जरिए मनी लांड्रिंग के आरोप पर झारखण्ड हाईकोर्ट में सुनवाई हो रही थी. लेकिन आज शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा रोक लगा दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में याचिका के सुनवाई योग्य होने पर फैसला सुरक्षित रख लिया है. 

मामले में शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता या ED सोरेन के खिलाफ पहली नजर में केस स्थापित नहीं कर पाए. शीर्ष अदालत ने ED पर सवाल उठाते हुए कहा कि आपके पास सोरेन के खिलाफ इतने सबूत हैं तो कार्रवाई करिए. PIL याचिकाकर्ता के कंधे पर बंदूक क्यों चला रहे हैं? यदि आपके पास ठोस सबूत हैं, तो आपको कोर्ट के आदेश की आवश्यकता क्यों है? पहली नजर में सामग्री होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने ED की सील कवर रिपोर्ट लेने से भी इंकार किया और कहा कि यदि आप जो कह रहे हैं उसके अनुसार चलेंगे तो यह एक खतरनाक मिसाल कायम करेगा. किसी पर भी आपराधिक मुकदमा चल सकता है. सुप्रीम कोर्ट अब तय करेगा कि झारखण्ड हाईकोर्ट में सोरेन के खिलाफ कार्रवाई चलती रहेगी या नहीं. 

प्रतिवादियों से जबरन वसूली के लिए वकील को गिरफ्तार किया जाना साधारण मामला नहीं

हेमन्त सोरेन के लिए पेश मुकुल रोहतगी ने कहा कि जस्टिस बानुमति ने एक बार कहा था झारखण्ड राज्य में ज्यादातर PIL का दुरुपयोग होता है. यह एक उचित खेल नहीं है जो चल रहा है, जिस तरह से जनहित याचिका दायर की जाती है. वकील को प्रतिवादियों से जबरन वसूली के लिए गिरफ्तार किया गया है यह कोई साधारण मामला नहीं है. इस अदालत ने बार-बार यह माना है कि खनन पट्टे के मामले में अयोग्यता की कार्रवाई शुरू नहीं होती है. यहां रिट (PIL) दाखिल होने से पहले लीज सरेंडर कर दी गई थी. (… साभार एनडीटीवी)

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झारखण्ड : 4 उपचुनावों में हार से विक्षुब्द निशिकांत को दिन-रात सिर्फ दिख रहा चुनाव

August 17, 2022 by najhma Leave a Comment

झारखण्ड : आडंबरवाद का जब पर्दाफाश होता है तो वह खुद को ढकने-तोपने के प्रयास में सभी को गंदा बताने लगता है. लोकतंत्र के मजबूतीकरण में आचार संहिता उल्लंघन मामले में बताने के बजाय भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा हेमन्त सरकार पर खीज निकाली गई. 

रांची : आडंबरवाद का जब पर्दाफास होता है तो वह खुद को बचाने के लिए सभी को गंदा बताने लगता है. ऐसा ही कुछ हाल भाजपा के गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे की हो चली है. महज चंद दिनों पहले राजद पार्टी द्वारा भी तंज कसा गया था कि लंबी चोटी रखने वाला हर बाबा ज्ञानी नहीं होता.  ज्ञात हो, झारखण्ड के पिछले लोकसभा चुनाव में आचार संहिता उल्लंघन के दो केस में नामजद आरोपित गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे मंगलवार को एसडीजेएम जितेंद्र राम की अदालत में हाजिर हुए. 

अधिवक्ता मनोज साह द्वारा मामले के आलोक में बताया गया कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान जसीडीह में सांसद निशिकांत समेत अन्य पर आचार संहिता उल्लंघन का मामला दर्ज हुआ था. सभी पर महागठबंधन के प्रत्याशी प्रदीप साह के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप था. इस केस में उन पर आरोप गठित किया गया. गोड्डा के केस में अभियोग का सारांश पढ़कर सुनाया गया. अब दोनों ही केस गवाही पर है. 17 अप्रैल 2019 को दिलीप साह के बयान पर यह मामला दर्ज हुआ था. इसमें सांसद महोदय को अकेले आरोपित बनाया गया था.

झारखण्ड की लोकतांत्रिक व्यवस्था को राजतंत्र कहा जाना मानुवाद का आडंबरवाद   

अब इस मामले में जनता को जवाब देने के बजाय सांसद महोदय अपनी खीज हेमन्त सरकार पर निकालते दिख रहे है. ठीक वैसे ही जैसे खुद की गंदगी ढकने के प्रयास में कह दिया जाता है कि सारी दुनिया गंदी है. ऐसे में सांसद महोदय द्वारा पार्टी कार्यकर्ताओं से उपचुनाव के लिए तैयार रहने का आह्वान किया जाना, पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच अपनी साख बचाने का प्रयास भर ही हो सकता है. और झारखण्ड की लोकतांत्रिक व्यवस्था को राजतंत्र कहा जाना मानुवाद का आडंबरवाद हो सकता है.  

साथ ही पत्रकारों से बातचीत में गोड्डा सांसद द्वारा कहा जाना कि बहुत जल्द दुमका और बरहेट में उपचुनाव होंगे. भाजपा कार्यकर्ताओं को अभी से तैयारियों में जुट जाना चाहिए, केवल मामले से छवि का संरक्षण ही हो सकता है. यदि ऐसा नहीं है तो उन्हें पत्रकारों को पहले चार उपचुनावों में भाजपा के लगातार हार के कारण को बताना चाहिए था. उन्हें बताना चाहिए था कि आखिर क्यों भाजपा को झारखण्ड में हुए एक भी उपचुनावों में सफलता नहीं मिली? क्यों उन्हें हर बार हेमन्त सोरेन से मुंह की खानी पड़ी है. 

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झारखण्ड : सीएम हेमन्त के शिक्षा प्रसार प्रण को मिला ग्रेट ब्रिटेन का समर्थन

August 13, 2022 by najhma Leave a Comment

झारखण्ड से उच्च शिक्षा के लिये ग्रेट ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में जाने वाले छात्रों के अलावा पेशेवर युवाओं को अब राज्य सरकार के साथ ब्रिटिश हाई कमीशन भी छात्रवृत्ति देगा.

रांची : नेक नियत को हमेशा ही मदद के हाथ मिल जाते हैं, ज्ञात हो झारखण्ड में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के शिक्षा प्रसार के प्रण को अब ब्रिटेन का साथ मिल है. झारखण्ड से उच्च शिक्षा के लिये ग्रेट ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में जाने वाले छात्रों के अलावा पेशेवर युवाओं को अब राज्य सरकार के साथ ब्रिटिश हाई कमीशन भी छात्रवृत्ति देगा. 

प्राप्त जानकारी के अनुसार, पांच को 50% तक की छात्रवृत्ति ब्रिटेन देगा बाकी झारखण्ड सरकार देगी. देश में पहली बार है जब किसी राज्य के युवाओं को विदेश में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए ब्रिटिश हाई कमीशन के साथ साझा पहल हुई है. इस संदर्भ में मुख्य सचिव द्वारा संबंधित विभागों के सचिवों के साथ बैठक आहूत हुई है. 

झारखण्ड सरकार एवं ब्रिटिश हाई कमीशन द्वारा मरङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा स्कॉलरशिप योजना के तहत राज्य के अनुसुचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिभाशाली युवाओं छात्रवृति प्रदान की जायेगी. संबंधित मुद्दे में राज्य सरकार, विदेश राष्ट्रमंडल और विकास कार्यालय (एफसीडीओ) ब्रिटिश उच्चायोग, नई दिल्ली के साथ तीन साल का साझा एमओयू 23 अगस्त को रांची में किया जाएगा. निश्चित रूप से यह कदम झारखण्ड के युवाओं के लिए अच्छी खबर लेकर आई है. 

विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग पर भी होगा विमर्श

इसके अलावा ब्रिटिश हाईकमीशन का प्रतिनिधिमंडल झारखण्ड सरकार के साथ विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर सहयोग के बिंदुओं पर भी विमर्श करेगा. विशेष कर सौर ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिये, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में आपसी सहयोग पर भी चर्चा होगा.

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झारखण्ड : आखिर सामंतवाद को ओबीसी सरकार व आदिवासी क्यों खटकते है?

August 13, 2022 by najhma Leave a Comment

झारखण्ड : विश्व आदिवासी दिवस पर देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्वारा शुभकामना संदेश न दिया जाना, सामंतवाद के कुंठा की पराकाष्ठा. और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा इस मुद्दे पर लिखने-बोलने के बजाय ओबीसी सरकार पर सवाल उठान – सोचनीय विषय…  

रांची : देश के लोह पुरुष सरदार पटेल कहते थे कि – “हम आदिवासी से नहीं लड़ सकते क्योंकि ए लोग आजादी की लड़ायी 1857 से पहले लड़ते रहे हैं. आदिवासी ही देश के सच्चे राष्ट्रवादी हैं”. लेकिन मौजूदा परिस्थिति में जब देश भर में आदिवासियों की दुर्दशा हो रही है. उसके जल, जंगल, जमीन, सांस्कृतिक धरोहरों और सरकारों पर सामंतवादियों द्वारा खुले आम हमले हो रहे हैं. ऐसे दौर में देश के प्रधानमंत्री ने गाजे-बाजे के साथ देश को पहला आदिवासी राष्ट्रपति “महामहिम द्रौपदी मुर्मू” दिया. जो निश्चित ही देश के बाहुजनो के लिए खुशी की बात है. 

ज्ञात हो, साल 1994 से संयुक्त राष्ट्र संघ के पहल पर प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को देश के प्रथम मूलवासी आदिवासी समेत भारत द्वारा विश्व आदिवासी दिवस धूम-धाम से मनाया जाता है. 11 जुलाई 2011, के राष्ट्रपति शुभकामना संदेह में श्रीमति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल द्वारा कहा गया था कि इस अवसर बुद्धिजीवियों और चिंतकों के बीच विचार-विमर्श से आदिवासियों के विकास हेतु कार्य योजनाएं बनाने में सहायता मिलेगी. 

देश के लिए खुशी की बात है कि इस परंपरा को हेमन्त सरकार द्वारा निभायी गयी. झारखण्ड में दो दिवसीय महोत्सव का आयोजन हुआ. लेकिन, वहीं दूसरी तरफ देश के लिए दुर्भाग्य है कि राष्ट्रपति द्वारा बधाई संदेश की परिपाटी के स्वस्थ शुरुआत के बावजूद देश के प्रधानमंत्री मोदी और महामहिम मुर्मू द्वारा शुभकामना संदेश न दिया जाना, न केवल गंभीर सवाल खड़े करते हैं, सामंतशाही विचारधारा की कुंठा की पराकाष्ठा को भी दर्शाता है. 

निशिकांत का ट्वीट भाजपा की पिछली बिहार सरकार से पल्ला झाड़ने का प्रयास 

ऐसे में इस गंभीर मुद्दे पर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा एक भी शब्द लिखने-बोलने के बजाय यह ट्वीट किया जाना कि बिहार में पिछले 32 वर्षों से पिछड़े वर्ग के लोगों का ही शासन है. विषय सोचनीय है. उनका यह बयान जहां एक तरफ भाजपा की पिछली सरकार से पल्ला झाड़ने का प्रयास भर है. वहीं दूसरी तरफ सामंतवादी सोच को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है. और सामाजिक मंच पर सवाल खड़ा करता है कि आखिर सामंतवाद को ओबीसी सरकार व समाज क्यों खटकता है?

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झारखण्ड जनजातीय महोत्सव : पूर्वजों की कुर्बानियां हमारे ऊपर बड़ा कर्ज – हेमन्त सोरेन

August 10, 2022 by najhma Leave a Comment

झारखण्ड जनजातीय महोत्सव : मैं, हेमन्त सोरेन आदिवासी हूं, यह मेरी पहचान है। आदिवासी बचाओ, जंगल, जमीन, जीव-जंतु सब स्वतः बचेंगे। समाज का सर्वांगीण विकास मेरी प्रतिबद्धता।

रांची : झारखण्ड जनजातीय महोत्सव के शुभारंभ सम्बोधन में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने सर्वप्रथम बाबा तिलका मांझी, धरती आबा बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हो, राणा पूंजा, तेलंगा खरिया, पोटो हो, फूलो-झानों, पा तोगान संगमा, जतरा भगत, कोमारम भीम, भीमा नायक, कंटा भील, बुधु भगत जैसे वीर नायकों को नमन के बीच बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर एवं डॉ. जयपाल सिंह मुंडा जी को भी विशेष रूप से याद करना दर्शाता है कि वह न केवल पूर्वजों के विचारधारा के प्रति कृतज्ञ हैं, उसपर दृढ़ता से खड़े भी रहते हैं. 

हेमन्त सोरेन ने कहा कि आदिवासी पहचान मेरी सच्चाई है और यहाँ मैं अपने समाज के पंचायत में अपनी बात रखने के लिए खड़ा हूँ. यह सच है कि आदिवासी समाज के जीवन में बदलाव लाने हेतु संविधान मे अनेकों प्रावधान किये गए हैं. परन्तु, बाद के नीति निर्माताओं की बेरुखी का नतीजा है कि आज भी आदिवासी वर्ग देश का सबसे गरीब, अशिक्षित, प्रताड़ित, विस्थापित एवं शोषित वर्ग है. जबकि हम आदिवासियों का इतिहास लम्बे संघर्ष एवं कुर्बानियों संकलन है. जिसपर समाज गर्व भी करता है. 

विकास के नए अवतार जनजातीय भाषा-संस्कृति को ख़तरा

झारखण्ड जनजातीय महोत्सव – आज आदिवासी समाज के समक्ष अपनी पहचान को लेकर संकट खड़ा हो गया है. क्या यह दुर्भाग्य नहीं है कि जिस अलग भाषा संस्कृति-धर्म के कारण हमें आदिवासी माना गया उस विविधता को आज के नीति निर्माता मानने को तैयार नहीं है. संवैधानिक प्रावधान चर्चा का विषय मात्र बन के रह गये हैं. मसलन, विकास के नए अवतार से इसे ख़तरा है। ऐसे में संख्या बल और धन बल के अभाव वाले इस संस्कृति को कैसे मरने दिया जा सकता है. 

ज्ञात हो, हिन्दू संस्कृति के लिए असुर हम आदिवासी ही हैं. जिसके बारे में बहुसंख्यक संस्कृति में घृणा का भाव लिखा गया है, मूर्तियों के माध्यम से द्वेष दर्शाया गया है, आखिर उसका बचाव कैसे सुनिश्चित होगा इस पर हमें सोचना होगा. ऐसे में अपने पूर्वजों की कुर्बानियां को बड़ा कर्ज मानते हुए उनके विचारधारा पर अडिग रहना ही समुदाय के लिए हितकर है. धन के बाली होते तो जैन-पारसी समुदाय जैसा अपनी संस्कृति को बचा पाते. मसलन, विविधता से भरे इस समूह पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. 

आदिवासी बचाओ, जंगल और जीव जंतु सब बचेगा 

आदिवासी एक स्वाभिमानी समुदाय है, मेहनत करके खाने वाली कॉम है. हम धरती आबा बिरसा, एकलव्य, राणा पूंजा की कॉम हैं, जिन्हें कोई झुका-डरा नहीं सकता. जिसके पवित्र सोच को कोई हरा नहीं सकता. हम इस देश के मूल वासी हैं. हमारे पूर्वजों ने ही जंगल बचाया, जानवर बचाया, पहाड़ बचाया? हाँ, आज यह समाज सोचने को मजबूर है कि जिस जंगल-जमीन की उसने रक्षा की आज उसे छीनने का तेज प्रयास हो रहा है. जानवर बचाओ, जंगल बचाओ सब बोलते हैं पर आदिवासी बचाओ कोई नहीं कहता. जबकि आदिवासी बचने से जंगल, जीव-जंतु स्वतः बच जाएंगे.

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झारखण्ड : जनजातीय समुदाय की मिटती पहचान को बचाने में हेमन्त के कुशल कदम

August 10, 2022 by najhma Leave a Comment

झारखण्ड : जनजातीय समुदाय की मिटती पहचान को बचाने के प्रयास में न केवल झामुमो विचारधारा की दृढ़ इच्छाशक्ति, एक आदिवासी मुख्यमंत्री के भीतर निहित सामाजिक संघर्ष कुशलता से आगे बढ़ता भी दिखता है…

रांची। देश में हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना के बीच हासिए पर खड़े आदिवासी, दलित, पिछड़ों व गरीब वर्ग की पहचान को बचाने की कवायद मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन का कार्यकाल करता दिखता है. और इस मंशा के अक्स में झारखण्ड में आयोजित जनजातीय महोत्सव, निश्चित रूप से झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के विचारधारा की दृढ़ इच्छाशक्ति और एक आदिवासी मुख्यमंत्री के भीतर निहित सामाजिक संघर्ष के जुझारूपन कुशलता से आगे बढ़ता दिखता है. 

जनजातीय भाषाओं, संस्कृति और परंपराओं के विशेषज्ञों की चर्चा में गूँजे कि “किवंदती किताबों की कहानियों का अहम हिस्सा बन जाती हैं, क्योंकि किवंदती, कथाएं झुर्रियों से झांकती जुबां से आती हैं, जिन्होंने पल-पल प्रकृति में खुद को महसूस किया है और प्रकृति को ही अपना इष्ट माना है”. और जनजातीय साहित्य, इतिहास, दर्शन को मनुष्य जाति के विकास में जनजातीय समुदाय के महत्व का सच सामने रखा जाए, तो निश्चित रूप से मानवता व मनुष्यता को परिभाषा मे कार्यकरम को मील का पत्थर माना जा सकता है. 

ट्राइबल लिट्रेचर व ट्राइबल एन्थ्रोपोलॉजी सेमीनार 

आयोजित सेमीनार में जनजातीय परंपराओं के जानकार द्वारा जनजातीय समुदाय का पहाड़ों, नदियों और जंगलों से अटूट रिश्ता पर व्याख्यान. प्रो. जनारदन गोण्ड (प्रयागराज), कविता करमाकर (असम), संतोष कुमार सोनकर, बिनोद कुमार (कल्याण, मुम्बई), दिनकर कुमार (गुवाहाटी), अरूण कुमार उरॉव (जेएऩयू, नई दिल्ली), हेमंत दलपती (ओडिशा), सानता नायक (कर्नाटक), रूद्र चरण मांझी (बिहार), डॉ. देवमेत मिंझ (छत्तीसगढ़), कुसुम माधुरी टोप्पो, महादेव टोप्पो और प्रो. पार्वती तिर्की (राँची) आदि साहित्य के विद्वानों की जनजातीय औरा पर चर्चा एक मंच पर संभव हो, तो निश्चित रूप से यह तस्वीर हेमन्त सोरेन की कुशलता व ईमानदार प्रयास को दर्शाता है.

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