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गुरु जी रूपी विचार एक जिद्द है जिससे खौफ खाता है सामंतवाद

August 31, 2022 by najhma Leave a Comment

गुरु जी एक विचार है … अगला भाग 2

जमशेदपुर निर्मल महतो शहीद स्थल – “झारखंड संघर्ष यात्रा” के हरी झंडी दिखाए जाने वाले दिन, मंचासीन एवं वहां उपस्थित जनता गुरु जी (shibu soren) को उपस्थित देख अचंभित थे, उनके मुख से आशीष वचन सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने केवल चंद शब्द कहे “भाषणबाजी नहीं संघर्ष करो” –इस शब्द की गंभीरता वही महसूस कर सकता है जो जलते झारखण्ड की ताप से झुलसा हो..

…घंटों माँ के गोद में सर रखे सोते रहे… जब आँख खुली तो आँसू सूख चुके थे और नई सुबह ने दस्तक दी थी।

वे अपने पिता के द्वारा कांसी राम को दिए वचन का मान रखते हुए गुरु जी (shibu soren) उनकी बेटी रूपी से रजरप्पा छिन्नमस्तिके देवी के समुख जीवन भर के लिए एक दूसरे के हो गए. गुरु जी के पिता ने वचन देते वक़्त कांसी राम से कहा था, तूने अपने बेटी के लिए चुना भी तो मेरे सबसे शरारती पुत्र को, तो उन्होंने कहा चुन लिया तो चुन लिया मुझे वही चाहिये।

दिन बीते लेकिन उनके आँखों में प्रतिशोध की ज्वाला नहीं बुझा. गुरु जी (shibu soren) ने अपने बड़े भाई राजा राम के पूछने पर फफक-फफक रोते हुए उनके सीने से लग इच्छा जताई कि उन्हें हजारीबाग जाकर श्री के. बी. सहाय एवं बद्री बाबू के बेटे केदार नाथ से मिलना है, उन्होंने देश की आजादी में अहम भूमिका निभाई है. शायद मेरे जीवन और झारखंडी समाज मे व्याप्त शोषण का कोई रास्ता निकल आये. राजा राम अब तक समझ चुके थे कि इस वेग को रोका नहीं जा सकता, उन्होंने पूछा कल तो तु दांत दर्द से इतने चिल्ला रहे थे कि भेंगराज भी घबरा गया था.

मैं केदार बाबू अधिवक्ता के दरवाजे सोकर रात काट लूँगा

वह ठीक हो गया है, दादा मुझे पांच रुपए चाहिए, मैं केदार बाबू अधिवक्ता के दरवाजे सोकर रात काट लूँगा. तीन बस चालकों से मेरी और एक से आपकी पहचान है दादा काम हो जाएगा. बड़े भाई ने कहा ठीक है लेकिन माँ कह रही थी कि तुमने कल से खाना नहीं खाया, नहीं दादा मैं जा रहा हूँ माँ से मांगकर खा लूँगा साथ में जाने की तैयारी भी कर लूँगा.

गुरू जी

सुबह माँ ने पूछा -कहाँ जा रहा है? (shibu soren) शिबू ( गुरु जी ) ने बस इतना कहा दादा से पूछ लिया है, फिर माँ ने उन्हें तुलसी-पिण्डा ले जा तिलक कर एक रुपया देते हुए सफ़र की मंगल कामना की. माँ के चरण छुए और निकल पड़े छह रूपये ले एक अनजान रास्ते पर अकेला लेकिन मजबूत इरादों के साथ.

अलग झारखण्ड राज्य के लिएअखिल भारतीय आदिवासी महासभा का गठन हुआ. इसके बाद ही shibu soren का दूर आने वाला था

इधर 1935 में प्रांतीय स्वायत्तता अधिनियम के अनुसार 1937 में बिहार विधानसभा के चुनावोपरांत कांग्रेसी मंत्रिमंडल का गठन हुआ परन्तु छोटानागपुर से उसमें किसी नेता को जगह नहीं मिली. यहाँ के लोगों को महसूस हुआ उनकी उपेक्षा हुई है.

30-31 मई 1938 रांची में उन्नति समाज, कैथोलिक सभा एवं किसान सभा ने सामूहिक बैठक कर छोटानागपुर एवं संथाल परगना को मिलाकर अलग झारखण्ड राज्य के उद्देश्य से अखिल भारतीय आदिवासी महासभा का गठन हुआ और थियोडोर सुरीन अध्यक्ष एवं पाल दयाल सचिव चुने गए. इनकी मांग को सर एम जी हैलेट ने 1938 में अविचारणीय कह खारिज कर दिया था. सेंटीनल ने 6 अगस्त, 1938 में इसका उल्लेख किया है.

इस हताशा भरे दौर के बाद हमारे गुरू जी (shibu soren) का दौर आने वाला था, उनके जिद्द भरे आन्दोलन का लोहा भाजपा के अटल जी ने भी माना है, इसलिए तो सामंतवाद उनके नाम से खौफ खाती है. अब समझा जा सकता है कि गुरु जी कैसे दौर से परिस्थियों से निकालकर हमें झारखण्ड अलग राज्य के रूप में दी है. सवाल है क्या हम युवा उनके लाज को बचा पा रहे हैं? …. जारी (शेष कहानी अगले लेख में )

Filed Under: Shibu Soren Tagged With: #Jharkhand Andolan, #sibu soren, guruji, jharkhand, jharkhand movement

बीमारी में भी shibu soren ने अलग झारखंड की अलख जगाये रखी  -6

August 31, 2022 by najhma Leave a Comment

बीमारी में भी दिसुम गुरू shibu soren ने अलग झारखंड की आस न छोड़ी. बीमारी से परेशान, न खाने को खाना था और न ही पीने को पानी. मजबूरन उन्हें जंगल की राह पकडनी पड़ी, मीलों दूर तक न घर न ही मानव का कोई निशान.

पिछले लेख में हमने देखा कि उपायुक्त के. बी. सक्सेना गुरूजी (shibu soren) के प्रति सॉफ्टकार्नर रखने लगे थे। इधर गुरूजी इस उधेड़बुन में थे कि किस विचारधारा वाले राजनीतिक दल का दामन वे थामे, जिससे पूरे झारखंड समाज का भला हो सके। इसी क्रम में पहले कांग्रेस, फिर सीपीआई और अंत में उन्होंने सोनोथ संथाल समाज का गठन किये। हालांकि क्षेत्रीय दल होने की वजह से लोग इसकी मान्यता व्यापक स्तर पर नहीं दे रहे थे और गुरूजी भी समझ रहे थे कि इस रास्ते राजनीतिक मुकाम तक नहीं पहुंचा जा सकता।

न ही पुलिस ने shibu soren का पीछा छोड़ा था और ना ही साहूकारों के गुंडों ने

इधर, अबतक न ही पुलिस ने इनका पीछा छोड़ा था और न ही साहूकारों के गुंडों ने। इन परिस्थियों के बीच एक गाँव से दूसरे गाँव का दोश्रा, न रहने का ठिकाना न खाने का -मतलब गुरूजी का जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त था -जंगलों में कई रातें गुजारने के कारण मच्छरों ने उन्हें काट-काट कर बीमार कर दिया। जिस गाँव में वे ठहरे हुए थे वहां पानी की भी भारी किल्लत थी -गाँव के समीप बहती पहाड़ी नदी व छीछले कुएँ से जैसे-तैसे जरूरत पूरी तो हो रही थी, लेकिन अब वे भी अब जवाब दे रहे थे।

हरलाडीह (पारसनाथ) के गोद में बसने वाला खूबसूरत गाँव) नज़दीक था, उन्होंने वहां जा गाँव के डॉक्टर से अपनी बीमारी का इलाज कराने को सोचा -उन दिनों गाँव या कस्बे कोई प्रशिक्षित डॉक्टर नहीं हुआ करता था, स्थानीय वैद्य जड़ी-बूटी जैसे हर्ब को मिलाकर कसैली व कड़वी काढ़ा तैयार किया करते थे जिससे रोग/बीमारी का उपचार किया जाता था। चूंकि गुरूजी दिमागी व शारीरिक तौर पर मजबूत शख्सियत थे, उन्होंने बुखार के हालत में ही अपने चंद साथियों के संग अपनी बीमारी का इलाज़ करवाने के लिए हरलाडीह की ओर रुख किये।

गुरूजी (shibu soren) बीमारी से परेशान, न खाने को खाना था और न ही पीने को पानी

हरलाडीह सीमा रेखा के समीप ही उन्हें डुगडुगी की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी जो गाँव में पुलिस के आने का संकेत हुआ करता था। मजबूरन उन्हें जंगल की राह पकडनी पड़ी, मीलों दूर तक न घर न ही मानव का कोई निशान। तेज बुखार ने उन्हें बेहोश कर वहीं ज़मीन पर पटक दिया। साथियों ने किसी तरह उन्हें संभाला और वहीँ सुला दिए, स्थिति यह थी कि गुरूजी बीमारी से परेशान, न उनके पास खाने को खाना था और न पीने को पानी। दो साथी पहाड़ी से नीचे उतर भीगी मिट्टी को भी  खोदे लेकिन पानी न मिल सका। रात का पहला पहर हो चला परिस्थिति विकट थी…

अभी रात का दूसरा ही पहर शुरू हुआ था कि गुरु जी के कानों में मेढकों की टरटराने की आवाज़ आयी। यकायक वे उठे और साथियों को कहा कि ध्यान से सुनते हुए इस आवाज़ का पीछा करो पानी ज़रूर मिलेगा। उनके  साथियों ने वैसा ही किया और पहुँच गए जलाशय तक, लेकिन पानी गन्दा था। कई दफा वे उस पानी को कपड़े से छान कर खुद भी पिए और गुरूजी को भी ला पिलाए – इस प्रकार लंबी रात कटी… अगली सुबह उन लोगों ने अंदाजा लगाया कि वे मधुबन से सटे हुए हैं, जहाँ जैन का उन दिनों बसेरा था,  उन्होंने सोचा कि यदि वे वहां तक पहुँच गए तो गुरु जी बच जायेंगे।

shibu soren आगे की लडाई लड़ने को कमर कस कर चल पड़े

किसी प्रकार हर बाधाओं को पार कर वे जैन मुनियों के आश्रम तक पहुंचे, जहाँ गुरूजी के बीमारी का इलाज़ हुआ और गुरूजी के संग उनके साथियों ने भंडारे का प्रसाद ग्रहण कर भूख भी मिटाए। गुरूजी जैन मुनियों के इलाज से शीघ्र ही ठीक हो गए, लेकिन गुरूजी ने उनको अपनी पहचान नहीं बताये, उन्होंने जैन मुनियों का आदर भाव से चरण स्पर्श किये और अपनी आगे की लडाई लड़ने को कमर कस कर चल पड़े। आज वही ऐतिहासिक पुरुष, वही शसक्त आवाज 10वीं बार लोकसभा का पर्चा भर दुमका से प्रत्याशी हैं -जिसे हारने के लिए पूरी देश की फासीवादी ताक़तें एक हो गए हैं। निश्चित रूप से यह झारखंडियों के लिए कठीन परीक्षा की घड़ी है।      

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