झारखण्ड जनजातीय महोत्सव : पूर्वजों की कुर्बानियां हमारे ऊपर बड़ा कर्ज – हेमन्त सोरेन

झारखण्ड जनजातीय महोत्सव : मैं, हेमन्त सोरेन आदिवासी हूं, यह मेरी पहचान है। आदिवासी बचाओ, जंगल, जमीन, जीव-जंतु सब स्वतः बचेंगे। समाज का सर्वांगीण विकास मेरी प्रतिबद्धता।

रांची : झारखण्ड जनजातीय महोत्सव के शुभारंभ सम्बोधन में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने सर्वप्रथम बाबा तिलका मांझी, धरती आबा बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हो, राणा पूंजा, तेलंगा खरिया, पोटो हो, फूलो-झानों, पा तोगान संगमा, जतरा भगत, कोमारम भीम, भीमा नायक, कंटा भील, बुधु भगत जैसे वीर नायकों को नमन के बीच बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर एवं डॉ. जयपाल सिंह मुंडा जी को भी विशेष रूप से याद करना दर्शाता है कि वह न केवल पूर्वजों के विचारधारा के प्रति कृतज्ञ हैं, उसपर दृढ़ता से खड़े भी रहते हैं. 

हेमन्त सोरेन ने कहा कि आदिवासी पहचान मेरी सच्चाई है और यहाँ मैं अपने समाज के पंचायत में अपनी बात रखने के लिए खड़ा हूँ. यह सच है कि आदिवासी समाज के जीवन में बदलाव लाने हेतु संविधान मे अनेकों प्रावधान किये गए हैं. परन्तु, बाद के नीति निर्माताओं की बेरुखी का नतीजा है कि आज भी आदिवासी वर्ग देश का सबसे गरीब, अशिक्षित, प्रताड़ित, विस्थापित एवं शोषित वर्ग है. जबकि हम आदिवासियों का इतिहास लम्बे संघर्ष एवं कुर्बानियों संकलन है. जिसपर समाज गर्व भी करता है. 

विकास के नए अवतार जनजातीय भाषा-संस्कृति को ख़तरा

झारखण्ड जनजातीय महोत्सव – आज आदिवासी समाज के समक्ष अपनी पहचान को लेकर संकट खड़ा हो गया है. क्या यह दुर्भाग्य नहीं है कि जिस अलग भाषा संस्कृति-धर्म के कारण हमें आदिवासी माना गया उस विविधता को आज के नीति निर्माता मानने को तैयार नहीं है. संवैधानिक प्रावधान चर्चा का विषय मात्र बन के रह गये हैं. मसलन, विकास के नए अवतार से इसे ख़तरा है। ऐसे में संख्या बल और धन बल के अभाव वाले इस संस्कृति को कैसे मरने दिया जा सकता है. 

ज्ञात हो, हिन्दू संस्कृति के लिए असुर हम आदिवासी ही हैं. जिसके बारे में बहुसंख्यक संस्कृति में घृणा का भाव लिखा गया है, मूर्तियों के माध्यम से द्वेष दर्शाया गया है, आखिर उसका बचाव कैसे सुनिश्चित होगा इस पर हमें सोचना होगा. ऐसे में अपने पूर्वजों की कुर्बानियां को बड़ा कर्ज मानते हुए उनके विचारधारा पर अडिग रहना ही समुदाय के लिए हितकर है. धन के बाली होते तो जैन-पारसी समुदाय जैसा अपनी संस्कृति को बचा पाते. मसलन, विविधता से भरे इस समूह पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. 

आदिवासी बचाओ, जंगल और जीव जंतु सब बचेगा 

आदिवासी एक स्वाभिमानी समुदाय है, मेहनत करके खाने वाली कॉम है. हम धरती आबा बिरसा, एकलव्य, राणा पूंजा की कॉम हैं, जिन्हें कोई झुका-डरा नहीं सकता. जिसके पवित्र सोच को कोई हरा नहीं सकता. हम इस देश के मूल वासी हैं. हमारे पूर्वजों ने ही जंगल बचाया, जानवर बचाया, पहाड़ बचाया? हाँ, आज यह समाज सोचने को मजबूर है कि जिस जंगल-जमीन की उसने रक्षा की आज उसे छीनने का तेज प्रयास हो रहा है. जानवर बचाओ, जंगल बचाओ सब बोलते हैं पर आदिवासी बचाओ कोई नहीं कहता. जबकि आदिवासी बचने से जंगल, जीव-जंतु स्वतः बच जाएंगे.

संपादकीय: यह विश्लेषण स्वतंत्र तथ्यों पर आधारित है।

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