झारखण्ड : हेमन्त सरकार की संवेदनशील के अक्स में एक बार फिर झारखण्ड में मूलवासी-जनजातियों के हक-अधिकार को संरक्षण मिला है. जल-जंगल-ज़मीन के संघर्ष को मजबूती मिली है. झारखण्डियों के आत्मविश्वास को ऊर्जा मिली है.
रांची : झारखण्ड में, हेमन्त सरकार की संवेदनशील के अक्स में एक बार फिर मूलवासियों-जनजातियों के हक-अधिकार को संरक्षण मिला है. हेमन्त सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार में नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के लिए ज़मीन नहीं देने या अवधि विस्तार नहीं किए जाने का निर्णय लिया गया है. इस फैसले ने मूलवासियों के अधिकार संरक्षण में एक बार फिर हेमन्त सरकार की ईमानदार मंशा को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है.
ज्ञात हो, नेतरहाट में लगभग 30 वर्षों से निरंतर चल रही जल-जंगल-ज़मीन बचाने के संघर्ष को स्थायी विराम मिला है. आदिवासी समुदाय की लंबी लड़ायी को न्याय मिली है. सरकार के इस निर्णय ने जनजातीय समुदाय को सारना कोड बिल की भांति लंबे इंतजार के बाद खुश होने का मौका दिया है. ज्ञात हो, नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की शुरुआत 1964 में हुई थी. बाद में तत्कालीन बिहार सरकार द्वारा 1999 में इसकी अवधि विस्तार हुआ. और यह सिलसिला भाजपा सत्ता के लंबे काल में भी जारी रहा.
नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज से प्रभावित जनता लगातार लगा रहे थे गुहार
संबंधित सभी ग्रामों द्वारा आमसभा के माध्यम से इस मुद्दे पर आवाज उठायी जा रही थी. जिसमें प्रभावित जनता द्वारा सरकार से गुहार लागाई गई थी कि लातेहार और गुमला जिला पांचवी अनुसूची क्षेत्र है और पेसा एक्ट 1996 के तहत ग्राम सभा को संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. मसलन, जनहित मंशा पर संवेदनशील हेमन्त सरकार में गंभीरता दिखायी गई. और मुख्यमंत्री द्वारा नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के जमीन की अवधि विस्तार प्रस्ताव को सहमति प्रदान नहीं की गई.
ज्ञात हो, झारखण्ड में छोटानागपुर प्रमंडल के प्रसिद्ध क्षेत्र नेतरहाट में जल, जंगल, जमीन के बचाव में, नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अधिसूचना रद्द करने हेतु मूलवासियों का यह संघर्ष लगभग 30 वर्षों से जारी था. जो समय के साथ बड़ा होता गया और नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज की अधिसूचना रद्द करने के आंदोलन में देश भर के शख्सियतों ने अपनी सहभागिता निभाई. अंततः इस लंबे संघर्ष को भी हेमन्त सरकार में स्थायी अंत मिला.
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