हेमन्त के फैसलों से झारखण्ड वासियों के बढ़ रहे हौसले 

हेमन्त के फैसलों से झारखण्ड वासियों के बढ़ रहे हौसले 

झारखण्ड : हेमन्त के फैसलों से सभी समस्याओं का स्थायी हल निकल रहा है. और राज्य की जनता पहली बार राहत महसूस कर रही है और अब उनके हौसले बुलंद हैं. 

रांची : झारखण्ड के 22 वर्षों के इतिहास में पहली बार जन पक्ष में सिलसिलेवार तौर पर मुख्यमंत्री द्वारा फैसले लिए जा रहे हैं. जिसे झारखण्ड के पूरे काल खण्ड में ऐतिहासिक रूप से स्वर्णिम काल माना जा सकता है. ज्ञात हो झारखण्ड एक आदिवासी, दलित, पिछड़ा बाहुल्य राज्य है और गरीब राज्य भी है.

इस राज्य में सबसे लंबा शासन का निर्णायक काल बीजेपी की रही है. लेकिन जन अधिकार के मामले में, राज्य में हर वर्ग की समस्याएं हल होने के बजाए गहराती चली गई. लेकिन हेमन्त के फैसलों से सभी समस्याओं का स्थायी हल निकल रहा है. और राज्य की जनता पहली बार राहत महसूस कर रही है और अब उनके हौसले बुलंद हैं. साथ ही उन्हें नई राह दिखा रही है.

बीजेपी काल में गहरायी मूल समस्याओं का हेमन्त के नीतियों से निकला हल 

ज्ञात हो, बीजेपी के पूर्व की शासन कालों में बाहरियों को समर्पित नीतियों के अक्स में, एक तरफ राज्य के मूल वासियों की नियुक्ति अनुबंधकर्मी के तौर पर हुई तो दूसरी तरफ स्थायी सरकारी कर्मियों के पेंशन जैसे अधिकार को समाप्त कर उनके भविष्य को अंधेरे में धकेल दिया गया. राज्य का हर वर्ग अपनी समस्याओं को लेकर आंदोलनरत रहे. राज्य में सभी वर्गों के मूलवासियों का अधिकार हनन हुआ. राज्य में विस्थापन व गरीबी बढ़ी. 

लेकिन राज्य में झारखंडी जनता द्वारा चुनी गई मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन वाली सरकार में ऐसे तमाम समस्याओं का स्थायी हल सिरे से निकल रहे हैं. उदाहरण के तौर पर पार शिक्षकों की समस्याएं का स्थायी निराकरण हुआ. राज्य कर्मियों की पुरानी पेंशन की मांग पूरी हुई. jpse को नियमावली मिली. वर्षों से रिक्त पड़े पदों पर नियुक्तियाँ हो रही है. 1932 खतियान आधारित नियोजन नीति के तरफ सरकार बढ़ चली है. 

आदिवासी-दलित-ओबीसी वर्ग से संबंधित समस्याओं का सीएम के फैसलों से निकल रहा हल

झारखण्ड में बीजेपी के पूर्व शासनकाल में आदिवासी-दलित-ओबीसी समुदाय के साथ घोर अन्याय हुआ. निर्दोष आदिवासियों की नक्सल के नाम पर दमन हुआ. आदिवासियों की जमीनें जबरन चहते पूँजीपतियों को लूटायी गई. ईसाई के नाम पर इनके अधिकार छीने गए. cnt-spt ऐक्ट को सजिशन खत्म करने का कुप्रयास हुआ. आदिवासियों को वनवासी कह हिन्दू पौराणिक कथाओं के शब्द असुर से फिर जोड़ा गया. इनकी सामाजिक-पारंपरिक व्यवस्थाओं को हाँसिए पर धकेला गया.  

दूसरी तरफ मूल दलित समुदाय को राजनीतिक जमीन से दूर किया गया. आरक्षित संवैधानिक सीटों पर बाहरी फर्जी प्रतिनिधियों को बिठाया गया. जिससे आरक्षित पदों की मूल भावना बे-अर्थ हुई और अनुसूचित समुदाय अपने अधिकार से बेदखल हुए. वहीं राज्य के ओबीसी वर्ग के आरक्षण में कटौती हुई. जातियों से संबंधित रोजगार-धंधे खत्म हुए. सरकारी शिक्षा व्यवस्था लाचार किए जाने से इन वर्गों का भविष्य अंधकारमय हुआ. हेमन्त शासन में इनकी समायाओं का स्थायी हल निकाल इन्हें संवैधानिक अधिकार से जोड़ा जा रहा है.  

सीएम के निर्णयों से राज्य की महिला हो रही है आत्मनिर्भर 

राज्य में पहली बार हेमन्त सरकार में गंभीरता से महिलाओं को समाज में भागीदार बनाया जा रहा है. राज्य की महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा से जोड़ा गया है. महिलाओं को समर्पित कई योजनाएं चलायी जा रही है. सखी मण्डल की दीदियों को सामाजिक उत्थान में मजबूती से भागीदार बनाया गया है. महिला शिक्षा, रोजगार, न्याय, खेल से लेकर तमाम आयामों में नीतियों के माध्यम से विशेष सहूलियत दे मानुवाद के पितृ सत्ता को चुनौती हेमन्त सरकार द्वारा दी गई है. मसलन, झारखण्ड के 22 वर्ष के इतिहास में पहली बार हेमन्त के फैसलों से झारखण्ड वासियों के हौसले बढ़ते दिख रहे हैं.

संपादकीय: यह विश्लेषण स्वतंत्र तथ्यों पर आधारित है।

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