झारखण्डी अस्मिता की अभिव्यक्ति को रोकने हेतु भाजपा-थिंकटैंक राजनीति 3 हिस्सों में कार्यरत 

झारखण्ड : झारखण्डी अस्मिता की अभिव्यक्ति को रोकने हेतु भाजपा व उसके थिंकटैंक राजनीति 3 हिस्सों में विभाजित हो कर रहे कार्य. 1 फूट डालने का प्रयास 2 केंद्री शक्ति का दुरूपयोग कर राज्यपाल जैसे पर् को कर रहा प्रभावित 3. झारखण्ड के उभरते नेताओं झूठ-अर्ध सच आरोपों के बल पर दबाने का प्रयास.

रांची : जोड़-तोड़ की राजनीति के अक्स में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा व उसके थिंकटैंक की राजनीति की समूची मशीनरी फ़िल्म ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ के प्रचार में जुटी है. भाजपा शासित प्रदेशों में फ़िल्म को टैक्स-फ़्री किया गया है और झारखण्ड जैसे गैर भाजपा शासित गरीब राज्यों पर भी फ़िल्म को टैक्स फ्री हेतु प्रेशर बनाया जा रहा है. भाजपा-संघ की ऐसी कई समझ पर आधारित राजनीति हैं जो लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए निरंतर चलते रहते हैं. इसका जीवंत उदाहरण झारखण्ड प्रदेश में झारखण्डी अस्मिता के उभार को उलझाने-भरमाने हेतु प्रयोग में लाये जा रहे फ़ासी तकनीक से समझा जा सकता है. 

झारखण्ड प्रदेश में साफ़ प्रतीत होता है कि भाजपा व उसके थिंकटैंक की राजनीति अपने हिडन एजेंडे को बढाने के मद्देनजर तीन हिस्सों में विभाजित हो मिशन में जुटे है. 

  1. विभीषण समुदाय-दल व चेहरों को आगे सरकार को अस्थिर करने का प्रयास.
  2. केन्द्रीय प्रभाव के बल पर 5वीं-6ठी अनिसुची राज्य में प्रभावी राज्यपाल जैसे पद के कार्यक्षेत्र में, अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर राज्य के विकास, बेरोजगारों के भविष्य को अन्धकार में धकेलने का प्रयास.
  3. जन हित बातों को रखने वाले नेताओं पर झूठे आरोप लगा कर, अपनी केन्द्रीय प्रचार तंत्र के माध्यम से दबाने का प्रयास कर रही है. ताकि झारखण्डी अस्मिता की आवाज प्रभावी ढंग से राज्य-देश के पटल पर उभार पाने से रोकने का प्रयास है.  

विभीषण समुदाय-दल व चेहरों को आगे सरकार को अस्थिर करने का प्रयास

  1. भाजपा व उसके थिंक टैंक की राजनीति के हिस्सा माने जाने वाली जेवीएम को प्रभावी आदिवासी चेहरे के अभाव में, उसके सुप्रीमो समेत वापस लाया गया. ऐसी परिस्थिति में जाहिर है मौकापरस्ती के अक्स में बाबुलाल मरांडी जैसे शख्स की मजबूरी है कि वह झारखण्डी अस्मिता के साथ खड़े तो नहीं हो सकते. लेकिन उस चेहरे से झारखण्डी अस्मिता को रोकने हेतु राजनीति करने का प्रयास है.
  2. प्रभावी दलित चेहरे के अभाव में भाजपा द्वारा जेवीएम से खरीद कर अमर बाउरी जैसे नेता को ला मंत्री बनाया गया. उस वक़्त दलित समुदाय को समझाया गया कि उसके समाज को मंत्री मिला है. लेकिन भाजपा विचारधारा के अक्स मंत्री जी न दलित समुदाय के औ न ही झारखंडी अस्मिता के हित में तिल भर भी पैर न हिल पाए. ज्ञात हो, इस महान उपब्धि के लिए अमर बाउरी को चुनाव के पहले समाज के पंचायत में बैठकर माफ़ी मांगनी पड़ी थी. अब भाजपा उस चेहरे के आसरे झारखण्डी दर्द को उभार कर सरकार को अस्थिर करने के प्रयास है.
  3. भाजपा व उसके थिंक टैंक आजसू जैसे दलों को इसी दिन के लिए लुभा कर रखती है. ताकि जब भी झारखण्डी अस्मिता के संरक्षण में कोई मजबूत अभिव्यक्ति उठे तो उस अभिव्यक्ति को स्थानीय दल के भ्रम के आसरे पतन किया जा सके. विडंबना है 1985 की स्थानीयता पर हामी भरने वाला दल आज 1932 आधारित स्थानीयता की मांग कर रहा है. ताकि सरकार अस्थिर हो और जल्दबाजी में गलत कदम उठाये. और झारखंडी अस्मिता के उत्थान में बढ़ चले कद थम जाए.

राज्य में प्रभावी राज्यपाल जैसे पद के अधिकार क्षेत्र में केंदीय प्रभाव की मदद से हस्तक्षेप 

रुपेश पांडे प्रकरण तथ्य का स्पष्ट उदाहरण हो सकता जिसके अक्स में न केवल भाजपा का मंशा सामने आया, आजसू विचारधारा का भी भीड़तंत्र की राजनीति के कैनवास में परिसीमन हुआ है. भाजपा चाहती तो, तो राज्य में भविष्य में ऐसी घटना रोकने हेतु महामहिम राज्यपाल से लिंचिंग बिल का मांग कर सकती थी. लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. और उसके महामहिम से भेटवार्ता पर प्रश्नचिन्ह उठे.

और द झारखण्ड (प्रिवेंशन ऑफ लिंचिंग) बिल 2021 को मामूली अनुवाद का मुद्दा बना महामहिम के दर से वापस आना संदेहास्पद है. ऐसे ही कई मुद्दे है जिसपर ऐसे ही समय की बर्बादी की गयी है. जिससे सरकार का जन कार्य – विकास की गति धीमी हुई है. फ़ासीवाद की ऐसी महीन राजनीति को झारखण्डी जनता को समझना ही होगा. अन्यथा चिड़िया खेत चग जायेगी.

जन हित बातों को रखने वाले नेताओं पर झूठे आरोप, केन्द्रीय प्रचार तंत्र के माध्यम से दबाने का प्रयास, झारखण्डी अस्मिता की आवाज के उभार को रोकने का ही प्रयास  

ज्ञात हो, सदन के पटल पर झारखण्डी अस्मिता के दर्द के मजबूत अभिव्यक्ति के रूप में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा समेत अन्य दल के कई विधायक उभर कर सामने आयें हैं. जिसे झारखण्ड की राजनीति में अच्छी पहल मानी जा सकती है और हेमन्त सरकार में इन नए नेताओं के झारखंडी भावनाओं को उभरने का मौका ऐसे वक़्त में मिला है जब देश की राजनीति की परिपाटी एकला चलो हो चली है. 

इस फेहरिस्त में सुदिव्य कुमार सोनू, समीर मोहंती, दसरथ गागराई, राजेश कच्छप, जोबा मांझी, दीपिका पांडेय सिंह, सीता सोरेन, अम्बा प्रसाद जैसे कई नाम है. जाहिर है इन प्रतिनिधियों की अभिव्यक्ति का उभार झारखण्डी अस्मिता को परिभाषित करता है. जो भाजपा राजनीति व उसके महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए सिरदर्द बन चला है. जाहिर इनके मजबूत अभिव्यक्ति का जवाब भाजपा के पास नहीं है. 

ऐसे में झूठ व अर्ध सच के माध्यम से, केन्द्रीय आईटी सेल के माध्यम से इन मजबूत आवाज़ों को दबाने का अनुभवी प्रयास हो चला है. बाउरी जी ने कल सदन में कहा कि विधायक सुदिव्य कुमार मुख्यमंत्री के प्रवक्ता है. अच्छी बात है मुख्यमंत्री एकला चलो की नीति से परे सभी के राय-मशविरे से साथ आगे बढ़ रहे है. सुदिव्य कुमार अनुभवी नेता है आगे बढ़ कर झारखण्ड का भार उठा रहे है तो इसमें गलत क्या हो सकता है. निश्चित रूप से यह मानसिकता झारखण्ड को राजनीतिक क्षेत्र में उभार देगा.

लेकिन भाजपा राजनीति का यह कुंठित प्रयास राज्य के प्रतीभाओं को दबाने के रूप सामने आना, उसी थिंकटैंक का हिस्सा भर है. विडंबना है कि भाजपा राजनीति ने भाई से लडाने के लिए भाई को ही सामने खड़ा कर दिया है. झारखण्ड को इस महीन षड्यंत्र को समझना ही होगा अन्यथा झारखण्ड रसातल में चला जाएगा.

संपादकीय: यह विश्लेषण स्वतंत्र तथ्यों पर आधारित है।

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