भाजपा राजनीति : राज्य के 40% जेनरल समेत तमाम मूलवासियों के छीने अधिकार

देश का छोटा नागपुर पठार और इसका आस पास का क्षेत्र सदियों से संपदा व संवैधानिक अधिकार दोहन का शिकार रहा है. नतीजतन इस क्षेत्र बसने वाले असंख्य मूलवासी जिसमे 60% अनुसूचित वर्ग व 40% जेनरल वर्ग संवैधानिक अधिकार से वंचित हुए. इसी पीड़ा ने झारखण्ड आन्दोलन रूप लिया था. अलग राज्य की माँग से शुरू हुआ आन्दोलन का कैनवास सामाजिक, सांस्क्रतिक, राजनीतिक, आर्थिक व भाषा-बोली से सम्बंधित था. दिशोम गुरु शिबू सोरेन के अगुवाई में बिहार पुनर्गठन बिल 2000 में पास होने के बाद इस क्षेत्र को अलग राज्य ‘झारखण्ड’ का दर्जा तो प्राप्त हुआ. लेकिन भाजपा के राजनीतिक चोला के अक्स तले सम्पदा व अधिकार दोहन जारी रहा.  

लगभग 17 वर्ष बाहरी मानसिकता की राजनीति ने प्रदेश में प्रत्यक्ष-आप्रत्यक्ष रूप से राज किया. जिसके अक्स में झारखण्ड आन्दोलन के नीव में रही तमाम जन हित एजेंडे/मुद्दे हासिये पर चले गए. उस बाहरी मानसिकता ने पहला हमला राज्य के जेनरल आबादी पर बोला. उस वर्ग को आरक्षण का डर दिखा कर अपनी राजनीति तो साधी, लेकिन फायद बाहरियों को दिया. मौजूदा दौर में स्थिति यह हो चली है कि राज्य के 40 फीसदी जेनरल समुदाय लगभग भूल चुके हैं कि वह झारखंड के मूलवासी हैं. 

दूसरा बड़ा हमला खनन क्षेत्रों में बोला. अवैध खनन में दलालों को संरक्षण दे राज्य में स्थापित पंचायत परम्परा के पंचों-बुद्धिजीवियों को झूठे मुकद्दमों में उलझा कर उसे पूरी तरह से शांत किया. फिर धिरे-धिरे उनकी साख़ पूरी तरह से ख़त्म कर दिया गया. जिसका खामियाजा किसी एक वर्ग को नहीं राज्य के तमाम वर्गों को भुगतना पड़ा है. क्योंकि राज्य की वह पंचायत पारम्परा केवल अपने क्षेत्रों में फैलने वाली बुराई ही नहीं रोकती थी. तात्कालिक राजनीति को मथते हुए अपने बच्चों-युवाओं व समाज के भविष्य में फैसले भी लेती थी. भाजपा की राजनीति द्वारा राज्य में स्थापित बुजुर्गों के सभी माप-दंड को धवस्त कर दिया गया.

40% जेनरल वर्ग के विधायिकी सीटों पर बाहरी काबिज हुए, तो OBC ने कमंडल पकड़ आरक्षण खोये 

एक तरफ बाहरी मानसिकता से ओत-प्रोत भाजपा की राजनीतिक षड्यंत्र झारखण्ड के समाजिक ताने-बाने को छित-विछित कर रही थी, तो दूसरी तरफ सत्ता में काबिज होने के कारण वह राजनीति आसानी से नीतियों में फेर-बदल कर राज्य की सम्पदा लूट को कानूनी जामा पहना में कामयाब हो रही थी. इस षड्यंत्र में राज्य के जेनरल विधायिकी सीटों पर कब बाहरी काबिज हो गए, राज्य के 40 फीसदी जेनरल वर्ग को भान ही नहीं रहा. भाजपा राजनीति के अक्स में दूसरा सबसे अधिक नुक्सान OBC और SC वर्ग का हुआ. उस राजनीति ने OBC के हाथों में कमंडल पकड़ा कब उसके आरक्षण हड़प लिया उसे इसका भान आज तक नहीं है. 

SC आरक्षित सीटों पर बाहरी SC नेताओं को जिता उसके के साथ किया खिलवाड़ 

भाजपा राजनीति ने एक तरफ राज्य के ही धन के बल पर SC वर्ग के वोट को आसानी से खरीदे, तो दूसरी तरफ SC आरक्षित सीटों पर बाहरी SC नेताओं को जिताया. अगर वह जीतते तो भाजपा के इशारे पर नाचने को विवश होते. और मूलवासी SC ने कानूनी लड़ाई लड़कर सीट खाली करवाने की स्थिति में आरक्षण की महत्ता बेमायने ही साबित होते. अंततः 5 साल का वक्त, जिसमे उसका विकास होता बर्बाद होते रहे. और उस समुदाय को केवल विस्थापन ही नशीब हुआ. ताजा उदाहरण के तौर पर गिरिडीह मेयर सीट को लिया जा सकता है. जहाँ बाहर के SC मेयर के हटाने के बावजूद SC को आरक्षण सीट का फायदा नहीं मिला. उप मेयर ही वर्तमान में मेयर है. और दूसरा बड़ा उदाहरण राज्य के मुख्यमंत्री पद पर बाहरी को बैठना है.

5वीं अनु सूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों के विकास में क्षेत्रीय भाषाओं की अहम भूमिका

ज्ञात हो, 5वीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों के विकास में क्षेत्रीय भाषाओं की अहम भूमिका होती है. मसलन, उस भाजपा राजनीति ने न केवल राज्य के क्षेत्रीय भाषा को हासिये पर धकेला, बहरी मूल के भाषाओं को झारखण्ड के माथे मढने का षड्यंत्र भी किया. और यह सब हुआ बाबूलाल जी कार्यकाल में. राज्य की पिछली सत्ता में भाजपा राजनीति द्वारा सीएनटी/एसपीटी जैसे सुरक्षा कवच को ख़त्म करने की साज़िश. ग्रामसभा को ख़त्म करने की साज़िश उपरोक्त तथ्यों के स्पष्ट उदाहरण हो सकते हैं. नतीजतन राज्य के चतुर्थ ग्रेड के नौकरियों तक में भी बाहरियों को फायदा मिलने का सच सामने आया. 

मसलन, 20 वर्षों के बाद राज्य की सत्ता पर काबिज झारखंडी मानसिकता, हेमन्त सरकार पहली ऐसी सरकार है जिसकी राजनीति राज्य को सिरे से ठीक करने के तरफ बढ़ी है. चूँकि क्षेत्रीय भाषाओं की उन्नति का मूलवासियों के उन्नति से अनुनाश्रय सम्बन्ध है. ऐसे में सरकार द्वारा क्षेत्रीय भाषाओँ को तरजीह दिया जाना, झारखण्ड के छले गए तमाम मूलवासी (60% अनुसूचित वर्ग व 40% जेनरल वर्ग) का संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित करेगा. यह कदम न केवल राज्य के मूलवासियों को अपने संस्कृति-परंपरा से फिर से जोड़ेगा, राजनीति से लेकर सरकारी नौकरियों, व्यापार आदि तमाम क्षेत्रों में भी मज़बूती से स्थापित करेगा.

ऐसे में हेमंत सरकार सभी वर्गों के मूलवासियों को साथ लेकर चलने की कवायद मौजूदा दौर में राज्य वासियों के लिए सुनहरे मौका हो सकता है. राज्य के तमाम मूल वासियों को अपने भविष्य के लिए फिर से मंथन करने का वक्त है. यह समस्या से एक होकर ही बाहर निकला जा सकता है.

संपादकीय: यह विश्लेषण स्वतंत्र तथ्यों पर आधारित है।

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